Ticker

6/recent/ticker-posts

सरगुजा संभाग के संग्रहण केंद्रों से 1 लाख 40 हजार क्विंटल धान गायब! जिम्मेदार कौन?


बैकुण्ठपुर। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी को हर सरकार “उत्सव” की तरह प्रस्तुत करती है और बेहतर खरीदी के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन जब इन दावों की हकीकत धरातल पर देखी जाती है तो कई गंभीर खामियां सामने आती हैं। ऐसा ही एक बड़ा मामला सरगुजा संभाग के पाँच जिलों से सामने आया है, जहाँ धान संग्रहण केंद्रों से लगभग 1 लाख 40 हजार 117 क्विंटल धान का हिसाब नहीं मिल पा रहा है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करती है, बल्कि करोड़ों रुपये के संभावित नुकसान का भी संकेत देती है। विदित हो कि राज्य सरकार ने वर्ष 2024–25 में धान भंडारण की नई व्यवस्था लागू करते हुए सरगुजा संभाग के सभी पाँच जिलों—कोरिया, सूरजपुर, सरगुजा, जशपुर और बलरामपुर—में धान संग्रहण केंद्र स्थापित किए थे। समितियों से खरीदा गया धान इन्हीं केंद्रों में रखा गया और यहीं से मिलरों द्वारा उठाव होना था। लेकिन अब खाद्य विभाग की शासकीय वेबसाइट पर दर्ज आंकड़े कई सवाल खड़े कर रहे हैं। केवल कोरिया जिले की बात करें तो बड़गांव स्थित संग्रहण केंद्र में कुल 1,19,753 क्विंटल धान की खरीदी दिखाई गई है, जिसमें से 1,14,188 क्विंटल का उठाव दर्शाया गया है। इस हिसाब से करीब 5,401 क्विंटल धान संग्रहण केंद्र में मौजूद होना चाहिए था, लेकिन मौके पर धान नदारद मिला। रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में भारी अंतर सामने आया। इसी तरह सूरजपुर जिले में 37,353 क्विंटल, सरगुजा जिले में 74,911 क्विंटल, जशपुर जिले में 4,800 क्विंटल और बलरामपुर जिले में 17,652 क्विंटल धान का उठाव अब भी शेष दिखाया जा रहा है, जबकि जमीनी हकीकत में इन केंद्रों में धान नहीं होने की जानकारी मिल रही है। कुल मिलाकर सरगुजा संभाग में 1,40,117 क्विंटल धान का कोई स्पष्ट हिसाब नहीं है। गंभीर बात यह है कि धान संग्रहण केंद्रों में अव्यवस्था का आलम भी सामने आया है। नमी से बचाने के लिए महंगे दाम पर खरीदा गया भूसा खुले में सड़ रहा है, तिरपाल फट चुके हैं और रखरखाव की स्थिति बेहद खराब है। इससे शासन को लगातार आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। पहले जब धान समितियों में रखा जाता था, तो सूखती या कमी की वसूली समिति प्रबंधकों से की जाती थी। अब सवाल यह है कि धान संग्रहण केंद्रों में हुई कथित सूखती या गुमशुदगी की जिम्मेदारी किसकी है? क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी या फिर कागजी कार्रवाई कर मामले को दबा दिया जाएगा? राज्य सरकार को हुए इस बड़े नुकसान की भरपाई आखिर कौन करेगा—यह सवाल अब आमजन और किसानों के बीच चर्चा का विषय बन चुका है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ