बैकुण्ठपुर। देश में बढ़ती महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों, रसोई गैस, खाद्य सामग्री और किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर एक राजनीतिक पर्चा चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रेस वार्ता में केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए दावा किया गया है कि पिछले 12 वर्षों में आम जनता पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ा है। इसमें वर्ष 2013 और वर्ष 2026 के बीच आवश्यक वस्तुओं की कीमतों की तुलना भी प्रस्तुत की गई है। प्रेस वार्ता में आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार ने बीते वर्षों में कच्चे तेल के भंडारण के लिए कोई नया बड़ा केंद्र स्थापित नहीं किया, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का असर सीधे देश की जनता पर पड़ रहा है। साथ ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि का उल्लेख करते हुए इसे आम आदमी की जेब पर सीधा असर बताया गया है।
प्रचार सामग्री में वर्ष 2013 की तुलना में वर्ष 2026 में खाद्य सामग्री और घरेलू उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में कई गुना वृद्धि होने का दावा किया गया है। इसमें आटा, दाल, तेल, रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल और मसालों के दामों का उल्लेख करते हुए महंगाई को लेकर केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया है। वहीं सोने की कीमतों में भारी उछाल का भी जिक्र किया गया है।
प्रेस वार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं और सरकारी खर्चों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें दावा किया गया है कि विदेशी दौरों पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, जबकि देश में आम जनता महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रही है। इसके अलावा प्रधानमंत्री द्वारा लोगों से ईंधन और तेल की बचत करने की अपील को भी राजनीतिक रूप से निशाना बनाया गया है। किसानों और उर्वरक संकट का मुद्दा भी इस प्रचार सामग्री में प्रमुखता से उठाया गया है। आरोप लगाया गया है कि किसानों को पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिल पा रही है, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है और उत्पादन प्रभावित हो रहा है। पर्चे में कहा गया है कि किसानों की आय दोगुनी करने के वादे पूरे नहीं हुए हैं। इसके साथ ही बेरोजगारी, बढ़ते कर्ज और घरेलू खर्चों में वृद्धि को लेकर भी चिंता जताई गई है। प्रचार सामग्री में दावा किया गया है कि महंगाई के कारण आम परिवारों का मासिक बजट बिगड़ चुका है और लोगों को आवश्यक जरूरतों के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है। हालांकि पर्चे में किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी चुनावी माहौल को देखते हुए विभिन्न दल और संगठन जनता के बीच अपने-अपने मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं। ऐसे में महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक बहस के केंद्र में रह सकते हैं।

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