बैकुण्ठपुर जिला मुख्यालय अंतर्गत महलपारा क्षेत्र में अवैध प्लाटिंग के बीच कीमती शीशम के पेड़ों की कटाई का गंभीर मामला सामने आया है। हैरानी की बात यह है कि यह पूरा घटनाक्रम वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली और निगरानी पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, महलपारा में पेड़ काटने के लिए विधिवत अनुमति ली गई थी, लेकिन जांच में यह तथ्य सामने आया कि जिस भूमि पर पेड़ काटे गए, वहां अवैध प्लाटिंग की जा रही है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अनुमति देते समय विभागीय कर्मचारियों द्वारा इस महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी की गई, या फिर आवेदक द्वारा जानबूझकर इसे आवेदन में छुपाया गया। दोनों ही स्थितियां नियमों का उल्लंघन दर्शाती हैं। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, पेड़ काटने की अनुमति केवल दो परिस्थितियों में दी जाती है—पहली, जब पेड़ से किसी व्यक्ति या संपत्ति को खतरा हो, और दूसरी, जब आवेदक आर्थिक रूप से कमजोर हो। महलपारा के इस मामले में न तो पेड़ों से किसी प्रकार का खतरा था और न ही आवेदक गरीब श्रेणी में आता है। इसके बावजूद अनुमति जारी होना गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करता है।
इस मामले में भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 26 के तहत बिना वैध कारण पेड़ों की कटाई दंडनीय अपराध है। साथ ही, छत्तीसगढ़ वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 2001 के तहत भी बिना उचित कारण और तथ्य छुपाकर अनुमति लेना अपराध की श्रेणी में आता है। यदि यह साबित होता है कि आवेदन में जानबूझकर गलत जानकारी दी गई, तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 177 (सरकारी अधिकारी को गलत सूचना देना) भी लागू हो सकती हैं।
एक और चौंकाने वाला पहलू यह सामने आया है कि कटे हुए कीमती शीशम के पेड़ को नियमानुसार आवेदक के कब्जे में देने के बजाय वन विभाग के एक कर्मचारी द्वारा उसे महलपारा स्थित शर्मा नामक व्यक्ति के यहां पहुंचाया गया। यह कृत्य स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है और इसमें भ्रष्टाचार या निजी लाभ की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इस प्रकार का कृत्य भारतीय वन अधिनियम की धारा 52 (वन उपज का अवैध परिवहन) के अंतर्गत भी आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध प्लाटिंग वाले क्षेत्र में पेड़ों की कटाई किसी भी स्थिति में उचित नहीं मानी जा सकती, क्योंकि यह पर्यावरण संरक्षण नियमों के विपरीत है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत भी इस तरह की गतिविधियों पर सख्त प्रतिबंध है, खासकर तब जब इसका सीधा असर पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन पर पड़ता हो। इस पूरे मामले ने वन विभाग की कार्यशैली, अनुमति प्रक्रिया और निगरानी तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर क्या कार्रवाई होती है, या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।



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